राजनांदगांव के राजा बलराम दास जी ने रायपुर की जनता के लिए पानी की व्यवस्था की थी

राजनांदगांव के राजाओं ने आजादी के आंदोलन में बौद्धिक जागृति का अलख जगाने में बड़ी भूमिका अदा की थी। राजनांदगांव के राजा बलराम दास ने तो रायपुर की जनता के पानी पीने के लिए बहुत बड़ी टंकी का निर्माण करवाया था। उक्त विचार दिग्विजय महाविद्यालय के इतिहास और समाजशास्त्र विभाग के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित पदम श्री गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री महादेव प्रसाद पाण्डे के सम्मान समारोह के अवसर पर प्रसिद्ध इतिहासकार डाॅ. रमेन्द्र नाथ मिश्र ने कहा। डाॅ.मिश्रा ने कहा कि 1857 की क्रान्ति से लेकर 1947 की आजादी छत्तीसगढ़ का गौरव पूर्ण इतिहास रहा है। शहीद वीरनारायण सिंह ने रायपुर जेल से भागकर अंग्रेजो से लोहा लिया था। सुरेन्द्र सिंह ने तो 1828 से 1884 तक अपने पूरे जीवन स्वतंत्रता की लड़ाई की। आज की युवा पीढ़ी ने स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छदता ले लिया है। पहली बार 20 दिसंबर 1920 महात्मा गांधी छत्तीसगढ़ आए थे उनके आगमन से पूरे छत्तीसगढ़ में एकता की लहर दौड़ पड़ी। उन्होने ंविद्यार्थियों को बतलाया कि 1 जनवरी 1906 को ही छत्तीसगढ़ का नक्शा बन गया था। कार्यक्रम का संचालन करते हुए डाॅ. शैलेन्द्र सिंह ने बतलाया कि इतिहास का अध्ययन पुस्तकों में दर्ज तथ्यों, तर्को से सभी करते है पर कोई सशरीर उपस्थित इतिहासकार जब इतिहास को जीकर उसकी व्याख्या करता है तो उसका अनुभव ही अविस्मरणीय होता है। उन्होने बतलाया कि राजनांदगांव की जनता ने स्वतंत्राता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई थी। सन् 1909 को ही राजनांदगांव में लोगो को जागरुक करने के लिए सरस्वती पुस्तकालय की स्थापना हुई थी। छत्तीसगढ़ की जनता तो दो मोर्चो पर लड़ाई लड रही थी एक राष्ट्रीय आंदोलन और दूसरी तरफ रियासतों के बीच वह खडी थी। इस अवसर पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पदम श्री महादेव प्रसाद पाण्डे ने बतलाया कि 13 वर्ष की उम्र में वे जेल गए और जेल में वे जमीन पर सोते थे तो घर पर उनके पिता भी जमीन पर सोने थेे। युवाओं को आजादी के लाभ के उठाए है पर इसके लिए की गई साधना का महत्व भी उनको समझना चाहिए। आजादी का मतवाला एक होता था लेकिन उसका संघर्ष पूरा परिवार करता था। उन्होनें कहा लोगो में आशिकी होनी चाहिए यह आशिकी स्वतंत्रता के पश्चात की नही वरन स्वतंत्रता के पहले की होनी चाहिए जो चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव ने देश के साथ की थी। पहले लोग गांधी जी के विचार को सुनकर उनका पालन करते थे, ऐसी आस्था जनता की नेताओं के प्रति होती थी। आज के परिप्रेक्ष्य में हमे गांधीजी के सिंद्धातों का परिपालन करते हुए स्वतंत्रता का महत्व समझना होगा। कार्यक्रम में गांधीवादी दस्तावेजो की प्रदर्शनी आशीष दास लगाई जिसमें 100 वर्ष पुराने अखबार नवजीवन तथा ऐतिहासिक चित्रों के साथ विभिन्न भाषाओं में गांधीवादी दस्तावेजो, समाचार पत्रों तथा गांधीवादी पत्रो का प्रदर्शन किया। जिसे इतिहास के विद्यार्थियों के अलावा अन्य लोगो ने भी देखा और लाभ उठाया। अतिथियों का सम्मान प्र.प्राचार्या डाॅ.चन्द्रिका नाथवानी ने शाल और श्रीफल से किया। इस अवसर पर डाॅ़अमिता बक्शी, डाॅ. एच.एस. अलरेजा, प्रो. ललिता साहू, मीनाक्षी महोबिया, प्रो. हीरेन्द्र बहादूर ठाकुर एवं बडी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित थे। कार्यक्रम का समापन में धन्यवाद ज्ञापन के साथ डाॅ. अनिल मंडावी ने किया ।